विज्ञान का स्वभाव नए सबूतों और सामने आ रहे तथ्यों के प्रति खुलापन रखने वाला होता है – यानी वह नए सबूतों व तथ्यों को खुले दिल से अपनाता है। इसलिए, नए दिशा-निर्देशों के हिसाब से तेजी से बदलाव करने और अपनी दिशा बदलने की इसकी क्षमता बेहद ही अहम है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने हाल ही में 16 निश्चित खुराक के संयोजन वाली या ‘फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन' (एफडीसी) दवाओं पर रोक लगाई है। यह कदम इस सबूत के आधार पर उठाया गया है कि इन दवाओं के संयोजन (कॉम्बिनेशन) का कोई चिकित्सीय आधार नहीं है, इन्हें ‘बेतुका या असुरक्षित’ माना गया है और इनसे मरीजों को खतरा हो सकता है। इन दवाओं में त्वचा संबंधी दवाएं, दर्द निवारक और ऐंठन-रोधी दवाएं, तथा एंटीबायोटिक-आधारित दवाएं शामिल हैं। एफडीसी एक ऐसी दवा होती है जिसमें दो या उससे ज्यादा सक्रिय औषधीय घटक (एक्टिव फार्माकोलॉजिकल इंग्रीडिएंट्स) होते हैं और जिन्हें एक ही खुराक में एक निश्चित अनुपात में मिलाया जाता है। इनका मकसद पुरानी बीमारियों (जैसे टीबी) में दवा लेने के बोझ को कम करके और कभी-कभी इलाज की असरदार क्षमता को बेहतर बनाकर, इलाज के नियमों का पालन करने में सुधार करना था। हालांकि, बेतुके संयोजन (कॉम्बिनेशन) बेअसर होने के साथ-साथ उलटे नतीजे देने वाले और नुकसानदेह भी साबित हो सकते हैं। ताजा आदेश के मुताबिक, तमाम राज्यों के औषधि नियंत्रकों (ड्रग कंट्रोलर), नियामक प्राधिकरण (रेगुलेटरी अथॉरिटी) और प्रवर्तन (एनफोर्समेंट) एजेंसियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि हालिया अधिसूचना को सख्ती से लागू किया जाए और उसका पालन हो। प्रतिबंधित एफडीसी का स्टॉक रखने और उन्हें बेचने से रोकने के लिए निर्माताओं, आयातकों, वितरकों और यहां तक कि अलग-अलग फार्मेसीज को भी निर्देश भेजे जाने चाहिए। यह पहली मर्तबा नहीं है जब स्वास्थ्य मंत्रालय एफडीसी के खिलाफ सख्त कदम उठा रहा है। एफडीसी पर प्रतिबंध लगाने का फैसला लेने से पहले एक विस्तृत वैज्ञानिक समीक्षा की जाती है। मार्च 2016 में, सरकार ने 330 से ज्यादा एफडीसी दवाओं पर उनके बेतुके होने के आधार पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया था। भले ही एफडीसी के चलते गोलियों की संख्या कम हो जाती है, जिससे कुछ खास तरह के मरीजों को फायदा होता है, लेकिन इसमें कुछ स्वाभाविक समस्याएं भी हैं: मरीजों को अलग-अलग खुराक की ज़रूरत हो सकती है, जो एफडीसी के साथ मुमकिन नहीं है; मरीजों को एलर्जी हो सकती है, लेकिन यह साफ नहीं होगा कि वे किस खास औषधीय घटक के प्रति प्रतिक्रिया कर रहे हैं। यह भी साफ है कि सभी मरीजों को असल में कॉम्बिनेशन में मौजूद सभी दवाओं की जरूरत नहीं हो सकती है, जिससे उन्हें अनावश्यक साइड इफेक्ट्स का सामना करना पड़ सकता है। एंटीबायोटिक एफडीसी से एक और संभावित नुकसान भी है: 2016 में प्रतिबंधित किए गए 330 एफडीसी में से 19 फीसदी एंटीबायोटिक थे। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि एंटीबायोटिक एफडीसी दवाओं का गलत इस्तेमाल देश में रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस) की बढ़ती समस्या को और भी गंभीर बना रहा है। यूं तो सरकार ने इन एफडीसी पर प्रतिबंध लगाकर एक अच्छा कदम उठाया है, लेकिन उसका काम अभी शुरू ही हुआ है। पहले भी कई बार ऐसा हुआ है कि प्रतिबंधित की गई दवाएं फार्मेसियों में बिकती रही हैं, क्योंकि यह जानकारी नीचे तक नहीं पहुंच पाई थी। सबूतों पर आधारित दवा के पक्ष में मजबूती से खड़े रहते हुए, सरकार को अपनी निगरानी और देखरेख करने वाली व्यवस्था को भी सक्रिय करना होगा ताकि इस प्रतिबंध का फायदा आखिरी व्यक्ति तक पहुंचना पक्का किया जा सके।